अपने पराये
खुद पर ही बाज़ी लगाया था
खुद को परखना भी जरूरी था
अपनों से उलझना भी जरूरी था
अपनों को अपनों से पहचाना भी था
एक पल में अपने पराये का भेद खुला
कदम तो केवल एक ही बढ़ाया था
वो जब भी रूठे हमने उन्हें मनाया था
हम टूटे तो वो ऐसे बैठे जैसे उन्हें भान न था
तुम्हारे लिए यह मेरा जीवन न था
तुम्हें मुझसे न कोई हानि न ही लाभ था
फिर क्यों मेरी प्रगति और मैं अखरता था
मैं तो बरखा की तरह हर तरफ बरसता था
फिर तुमने क्यों मुझे यह भेद सिखलाया
अब कहां बरसे मेघ यह भी तुम समझाओगे
सूरज ने पानी सागर से लिया था
वायु वाहक बन मुझे पहुंचाया था
किस हक से मुझ पर तंज कसते हो
सूरज सागर वायु बतलाओ तुम कौन हो
✍️ सुरेन्द्र कुमार बिश्नोई


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