महान व्यक्तित्व श्री चौखाराम मांजू
मैंने महापुरुषों की जीवनी का बहुत अध्ययन किया है, लेकिन एक महापुरुष मेरे अपनों में से थे, हालांकि वह प्राणी मात्र में समदर्शी थे, लेकिन मेरे और मेरे परिवार के लिए अति विशिष्ट थे।
मेरे दादाजी के ज्येष्ठ भ्राता श्री चौखाराम मांजू अत्यंत सरल स्वभाव के धनी, प्राणी मात्र में समदर्शी, राष्ट्र हितेषी, धार्मिक और दयालु व्यक्तित्व के रूप में अपनी एक छवि स्थापित कर के इस संसार से विदा हो गए। हमारा सौभाग्य रहा हैं कि ऐसे महापुरुष मेरे कुल में अग्रणी रहे और उनके अंत समय में हम सभी उनके समीप रहें।दादाजी को गीता, रामायण, महाभारत और भागवत जैसे ग्रन्थ कंठस्थ थे, जब भी दादाजी से मेरी मुलाकात होती तो अवश्य ही धार्मिक चर्चा होती और कुछ नई कथाओं के माध्यम से मुझे समझाया जाता की जीवन में क्या अधिक महत्वपूर्ण है और क्या नहीं। हालांकि दादाजी से मुलाकात इतनी आसान नहीं थी क्योंकि उनके जीवन का अधिकतर समय प्रवास में व्यतीत होता था, दादाजी गृहस्थ थे लेकिन मोह माया से अलिप्त जैसे जलज कीचड़ में रह कर भी साफ होता है। इसी प्रवास ने दादाजी को हमारे साथ समय व्यतीत करने के बहुत काम मौके दिये और इस संसार से जल्दी विदाई को शायद मजबूर किया, क्योंकि उनके प्रवास में दादाजी किसी पर बोझ नहीं बने धर्म चर्चा के साथ ही खाती का काम भी किया करते थे तो जहां भी जाते लकड़ी से चारपाई, दरवाजे आदि बना कर ही जीवन यापन करते, इसी तरह भोजन पर भी विशेष ध्यान नहीं देते थे (मेरी अंतिम मुलाकात में जब वे कर्क रोग से पीड़ित थे तो उनके भोजन पर विशेष ध्यान रखना होता तो दादाजी को बोला गया था कि आप दूध मांग कर ले लिया करो भोजन परोसने वाले से तो उनका उत्तर था मैं कोई ब्राह्मण नहीं हूं जो मांग कर भोजन ग्रहण करूं ) जो उनके शरीर पर विपरीत असर पड़ा और रक्त कर्क रोग से पीड़ित हो गए।
दादाजी के साथ अंतिम मुलाकात में उन्होंने मुझे कीचक (महाभारत के अज्ञातवास में राजा विराट की पत्नी का भाई) की कथा बताई थी। वर्ष पूर्व हम दादाजी के साथ धार्मिक यात्रा पर गए थे हरिद्वार, काशी और प्रयागराज (कुंभ स्नान भी किया)। मेरी बहुत सारी यादें जुड़ी हुई हैं दादाजी से, लेकिन कभी भी क्रोध नहीं देखा उनके मुखमंडल पर।
जितना लिखूं उतना कम है, शब्द की भी एक सीमा होती हैं, पर दादाजी व्यक्तित्व उन सब से परे था, कहते है ना जैसी माता वैसा पुत्र। हालांकि दादाजी की मां के साथ मैंने ज्यादा समय तो नहीं व्यतीत किया परन्तु अपने बचपन में अधिकतर उनके आस पास ही रहा हूं क्योंकि वे हमारे साथ ही रहती थी, उनको संसार से विदा हुवे १५ वर्ष बीत चुके हैं परन्तु मेरी माता की कहानियों में वे आज भी देवी के रूप में हमारे बीच विद्यमान है, क्योंकि दादाजी की मां के बारे में अब तो केवल दादाजी या मेरी मां ही बताती रहती हैं और किसी से उनके बारे सुना नहीं हैं, हालांकि उनका नाम श्रीमती नेनू देवी आज भी संचोरी क्षेत्र के लोग नहीं भूले है, उस देवी का पुत्र श्री चौखाराम मांजू जैसा होना कोई आश्चर्य नहीं है।
चाहे दादाजी हो या दादीजी दोनों की परिस्थिति ने ही उन्हें महान बनाया है, मेरे लिए आज भी दोनों ही श्रद्धेय, पूजनीय एवम् देव तुल्य हैं।
आदरणीय दादाजी को शत शत नमन एवम् विनम्र श्रद्धांजलि।
✍️ सुरेन्द्र कुमार बिश्नोई

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