अनचाहे अतिथि

किसान के माथे की सिकन, परेशानियों पर एक और परेशानी, जाएं तो कहां जाएं, करे तो क्या करें। ये अनचाहा अतिथि कहां से टपक पड़ा, मारवाड़ में पहले से किसान तो परेशान रहता ही है, कभी पानी कि समस्या, कभी अकाल, कभी अतिवृष्टि। समय समय पर तरह तरह की समस्याएं आती रहती हैं और एक इस अनचाहे अतिथि के रुप में हमरे समकक्ष नई समस्या आ खड़ी हुई। सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता किसान, सरकार से दरकरार करता किसान और मेरे किसान भाइयों को गुमराह करती सरकार और उनके प्रशासनिक कर्मचारी/अधिकारी।
पश्चिमी राजस्थान या मारवाड़ (मृत्यु का द्वार विशेषकर किसान के लिए) के लोग शुरुआत से पलन्यान के आदि रहे है कभी रोजगार की तलाश में दक्षिण भारत में जाना, कभी पशुपालकों द्वारा अकाल में मेवाड़, हाड़ौती और गुजरात पलायन करना प्रमुख है। परन्तु अब जब पानी को राजस्थान नहर और नर्मदा नहर द्वारा मारवाड़ एक एक बड़े हिस्से को सिंचाई के लिए दिया जाने लगा तो नई समस्या आ खड़ी हुई। कभी अतिवृष्टि की वजह से नहर का टूट जाना जिससे पूरा क्षेत्र ही बाढ़ में परिवर्तित हो जाता है तो कभी अनावृष्टि से खाने को दाने तक नसीब नहीं होते। यहां तक तो ठीक था हमने मान लिया था ये तो प्राकृतिक आपदा हैं (मुझे तो इसमें भी प्रशासनिक नाकामी नजर आती हैं क्योंकि नहरों के निर्माण को सही ठंग से किया ही नहीं जो अतिवृष्टि के पानी को अपने अंदर समा पाए और जल प्रबंधन के प्रति ना तो प्रशासन कोई जिम्मेदाराना नजरिया रखता है और ना ही लोगो को जागरूक करने में कोई दिलचस्पी दिखाई देती हैं)। 

अब अचानक न जाने कहां से सीमाओं के उस पार से अनचाहा अतिथि आ खड़ा हुआ, एक दो होते तो संभल जाते संभाल भी लेते परंतु ये कोई एक दो या सौ या हजारों में नहीं लाखों करोड़ों के समूह में आए और किसान कुछ समझ पाता तब तक तो सारे आसमान में जहां तक नजर जाए भिनभिनाते हुए टिड्डीयों के समूह, जहां डाले पड़ाव वहां एक हरित तिनका भी नजर ना आए, हरे भरे लहलहाते खेतों को पल भर में साफ कर दे।
बेखर प्रशासन को कहां तक हमदर्दी है किसान के दर्द से, अच्छे से जानता हूं मेरे महान भारतवर्ष के इस प्रशासन को जो कोई कसर नहीं छोड़ता आम आदमी को लूटने की उसे क्या मतलब मेरे किसानों की, ये प्रशासनिक कर्मचारी क्यों भूल जाते हैं कि इनके बाप दादा भी कभी किसान ही थे फिर भी दर्द नहीं समझते और ये राजनेता अपनी राजनीति चमकाने न जाने कहां से आ जाते है विधायक और मंत्री कहते हैं भारत सरकार संसाधन नहीं दे रही और सांसद कहते हैं हम तो आपके साथ खड़े है राजस्थान सरकार नाकाम हैं। भाई हम जानते है नाकाम तो ये किसान ही है जो नासमझी में आप जैसे लोगो को चुन के आ गया जिनको सिर्फ अपनी राजनीति करनी है किसान की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं हैं।
प्रशासन कह रहा हैं कि टिड्डी मारने की दवाई का छिड़काव नहीं कर सकते क्योंकि इससे अन्य पक्षी और पशुओं पर भी जानलेवा प्रभाव पड़ेगा, मानता हूं पड़ेगा और मै खुद भी इसका विरोध करता हूं क्योंकि किसान मित्र पक्षियों के मरने से दीर्घकालीन नुकसान किसान का ही होगा, परन्तु मेरा प्रश्न उसी प्रशासन एवम् राजनेताओं से है कि ये पहली बार तो नहीं कि अनचाहा अतिथि आया हो, फिर क्यों नहीं सचेत रहा और मुसीबत आने से पहले ही छुटकारा पाया जा सकता था। परंतु किसको पड़ी है किसान की, आखिर नाकाम रहा फिसड्डी प्रशासन।
स्वागत है अनचाहे अतिथि क्योंकि हम है लाचार स्वागत के अलावा करें भी तो क्या।
                                   ✍️सुरेन्द्र कुमार बिश्नोई

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