मैं सिन्धु का आब हूं
मैं सिन्धु का आब हूं,
नापाक पाक धरती से गुजरता हूं।
मैं खुली किताब हूं,
अनपढ़ों की दुनिया में रहता हूं।
मैं भारत का जवाब हूं,
गांव की माटी छानता हूं।
मैं कौरवों का भीष्म हूं,
हस्तिनापुर में मजबूर हूं।
मैं ऋतुओं में ग्रीष्म हूं,
कड़ी धूप सहता हूं।
मैं महाभारत का कर्ण हूं,
सूतपुत्र कहलाता हूं।
मैं दशरथपुत्र शत्रुघ्न हूं,
राम, भरत व अवध निहारता हूं।
मैं नेतृत्व में लाल बहादुर हूं,
स्वतंत्र अस्वतंत्र भारत का नेता हूं।
मैं भारत का सुभाष हूं,
मूर्खों का स्वतंत्रता समर लड़ता हूं।
मैं गिलगिट बाल्टिस्तान हूं,
भारत का अभिमान हूं।
मैं तो सिन्धु सागर हूं,
रत्नाकर से भी प्यारा हूं।
मैं विश्व गुरु भारत हूं,
पर इंडिया कहलाता हूं।
मैं नई शुरुआत हूं,
मृत्यु का नाम रखता हूं।
मैं स्वतंत्र भारत का हिन्दू हूं,
मैं सेक्युलरिजम की चादर ओढ़े हूं।
मैं भारत का भाग्य हूं,
भगवा हिन्दुत्व गीता ज्ञान हूं।
मैं भारत का ख्वाब हूं,
मैं सिन्धु का आब हूं।
✍️ सुरेन्द्र कुमार बिश्नोई


अद्भुत उपेक्षाओं का संग्लन, भाई साहब😊
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर और मर्मस्पर्शी पंक्तिया ।
जवाब देंहटाएंबहुत ही सूंदर और मर्मस्पर्शी पंक्तियां।
जवाब देंहटाएंअद्भुत
जवाब देंहटाएंBeautiful lines.
जवाब देंहटाएंJai hind